Thursday, February 10, 2011

राही

राही चलता चल, राह बहुत लम्बी तेरी !
सुख -दुःख हँसना-रोना तो चलता रहता है,
ना हो इनसे मंद गति तेरी !!

पथ से भटकाने वाले तो बहुत हैं, गिने चुने ही सही राह दिखाते !
सही और गलत को पहचाने यदि तू , कट जाएगा मग हंसते हंसते !
मार्ग की बाधाएं कदम डिगायेंगी, वीर वही जो अडिग चलते जाते !
मजबूत इरादे, उच्च मनोबल और श्रम ही नौका पार लगाते !!
राही चलता चल...

हो सकता है पास दिखे लक्ष्य तुझे, लेकिन तुझे नहीं सुस्ताना है !
खरगोश चाहे बन किन्तु उसकी गलती को नहीं दोहराना है !
एकाग्र और अटल यदि लक्ष्य है तेरा, तुझको क्यों घबराना है !
एक बार वरण करो विजयश्री, फिर जीवन तो उत्सव का बहाना है !!
राही चलता चल...

बारिश

थोड़ी सी बारिश क्या हुई, इंसान कहता है कीचड हो गया हर जगह !
अरे क्या तू बाहर देखे, तू झाँक तो मन के भीतर भी
भरा कीचड कितना अन्दर भी..
जान ले तू अपने भीतर के कल्मष की वजह!!

रहा नहीं प्रेम और रिश्तों का कोई मूल्य, भाई ही करे भाई से द्वेष ;
स्वार्थ में हो उन्मत्त मूढ़ मनुज भूल गया सब नाते विशेष |
सोचें कैसे हो दूर मन की यह मलिनता, कैसे हों दूर आपसी क्लेश ;
सोचें समझें और विचारें, कैसे हो नियंत्रित ये भावावेश ||

बाहर का कीचड तो धुल जायेगा, एक अच्छी 'बारिश' की देर है ;
कभी धुले मन का भी मैल, ऐसी भी क्या कोई 'बारिश' है?
प्रेमसुधा कभी तो बरसे,
कभी तो निज के अतिरिक्त किसी हेतु हूक उठे मन में
ऐसे किसी दिन के इंतज़ार में मानवता आज है
बाहर से ज्यादा भीतर का मैल मिटाना ज़रूरी आज है....