इत्तेफाक से शुरू हुआ एक सफ़र,
अजनबी जिसमें सब हमसफ़र..
आँखों में सबकी एक ही सपना,
फले फूले देश ये अपना..
पटरियों पर दौड़ती ज़िन्दगी,
हर दिन बढती जाती बंदगी..
रोज़ मिलते जोशीले नए चेहरे,
हर ओर गूंजते थे कहकहे ..
हर दिन की एक नयी कहानी,
जीना सिखाती हर एक जिंदगानी..
अचरज होता हर एक को सुनकर,
खुश देखा लोगो को सपने बुनकर..
बोलने से ज्यादा सुनना सीखा,
देश को कुछ करीब से देखा..
कुछ समस्याओं का 'निदान' भी सोचा,
अंतर्मन की 'गूँज' को भी खोजा..
साबरमती की शांति में खोये,
बिछुड़ते वक़्त मन ही मन रोये..
जाने क्या पाया उन चंद दिनों में,
एक नयी सी दिशा मिली जीवन में !!
- -सभी यात्रियों को समर्पित जिनके साथ मैंने 'जागृति यात्रा' का अद्भुत अनुभव लिया