Wednesday, January 25, 2012

सफ़र

इत्तेफाक से शुरू हुआ एक सफ़र,
अजनबी जिसमें सब हमसफ़र..
आँखों में सबकी एक ही सपना,
फले फूले देश ये अपना..

पटरियों पर दौड़ती ज़िन्दगी,
हर दिन बढती जाती बंदगी..
रोज़ मिलते जोशीले नए चेहरे,
हर ओर गूंजते थे कहकहे ..

हर दिन की एक नयी कहानी,
जीना सिखाती हर एक जिंदगानी..
अचरज होता हर एक को सुनकर,
खुश देखा लोगो को सपने बुनकर..

बोलने से ज्यादा सुनना सीखा,
देश को कुछ करीब से देखा..
कुछ समस्याओं का 'निदान' भी सोचा,
अंतर्मन की 'गूँज' को भी खोजा..

साबरमती की शांति में खोये,
बिछुड़ते वक़्त मन ही मन रोये..
जाने क्या पाया उन चंद दिनों में,
एक नयी सी दिशा मिली जीवन में !!

- -सभी यात्रियों को समर्पित जिनके साथ मैंने 'जागृति यात्रा' का अद्भुत अनुभव लिया

Tuesday, May 17, 2011

बारिश की पहली बूँदें

वो बारिश की पहली बूँदें , गिरी जब मेरे गालों पर |
नाच उठा मन - मयूर , बादलों के गर्जन पर |
ग्रीष्म के थपेड़ों से ग्रस्त , प्यासा था हरेक मन |
बारिश की 'मीठी' बूंदों से हर्षाया तन मन ||

टप टप गिरती बूंदों से बढ़ता जाता मेरा उल्लास |
पावस की पहली छुअन का , पुलकन भरा अहसास |
यादें हुई ताज़ा पानी से लबालब घर के चौक की |
तरंग दौड़ गयी कागज़ की नाव तैराने के शौक की ||

कमीज़ खोलकर बारिश में सरपट दौड़ जाने की चाह |
नंगे बदन पर गिरती ठंडी बूंदों की चुभन की आह |
पाकर ठंडक हुआ मुदित उल्लसित अंतर्मन |
वो बारिश की पहली बूँदें , भीगा गयी मेरा तन मन ||

Thursday, February 10, 2011

राही

राही चलता चल, राह बहुत लम्बी तेरी !
सुख -दुःख हँसना-रोना तो चलता रहता है,
ना हो इनसे मंद गति तेरी !!

पथ से भटकाने वाले तो बहुत हैं, गिने चुने ही सही राह दिखाते !
सही और गलत को पहचाने यदि तू , कट जाएगा मग हंसते हंसते !
मार्ग की बाधाएं कदम डिगायेंगी, वीर वही जो अडिग चलते जाते !
मजबूत इरादे, उच्च मनोबल और श्रम ही नौका पार लगाते !!
राही चलता चल...

हो सकता है पास दिखे लक्ष्य तुझे, लेकिन तुझे नहीं सुस्ताना है !
खरगोश चाहे बन किन्तु उसकी गलती को नहीं दोहराना है !
एकाग्र और अटल यदि लक्ष्य है तेरा, तुझको क्यों घबराना है !
एक बार वरण करो विजयश्री, फिर जीवन तो उत्सव का बहाना है !!
राही चलता चल...

बारिश

थोड़ी सी बारिश क्या हुई, इंसान कहता है कीचड हो गया हर जगह !
अरे क्या तू बाहर देखे, तू झाँक तो मन के भीतर भी
भरा कीचड कितना अन्दर भी..
जान ले तू अपने भीतर के कल्मष की वजह!!

रहा नहीं प्रेम और रिश्तों का कोई मूल्य, भाई ही करे भाई से द्वेष ;
स्वार्थ में हो उन्मत्त मूढ़ मनुज भूल गया सब नाते विशेष |
सोचें कैसे हो दूर मन की यह मलिनता, कैसे हों दूर आपसी क्लेश ;
सोचें समझें और विचारें, कैसे हो नियंत्रित ये भावावेश ||

बाहर का कीचड तो धुल जायेगा, एक अच्छी 'बारिश' की देर है ;
कभी धुले मन का भी मैल, ऐसी भी क्या कोई 'बारिश' है?
प्रेमसुधा कभी तो बरसे,
कभी तो निज के अतिरिक्त किसी हेतु हूक उठे मन में
ऐसे किसी दिन के इंतज़ार में मानवता आज है
बाहर से ज्यादा भीतर का मैल मिटाना ज़रूरी आज है....

Wednesday, January 12, 2011

हमारे गाँव

शहर की चकाचौंध से कोसों दूर,
निर्मल अति सुन्दर हमारे प्यारे गाँव |
जीवन की धुरि, देश के पोषक नूर,
सांस्कृतिक सुगंध से महकते हमारे प्यारे गाँव ||

कुए की पाल पर पानी भरती पनिहारी,
खेतों में पसीने की बूंदों से महकते किसान |
मिटटी को आकार देती चाक चलाती कुम्हारी,
जीवंत और सुहासित गाँव, हमारे देश के प्राण ||

समरसता से मिल जुल कर रहते नर नारी,
पेड़ों पर उछल कूद करते बालक नादान |
हरे भरे खेतों से लिपटी वसुधा की महिमा न्यारी,
कितना सुन्दर गाँवों का जीवन प्राणवान ||

हरी भरी भूमि पर चरती गैया प्यारी,
क्रीडा करते बच्चों से जीवंत खेल मैदान |
घर की दीवारों से आती गोबर की महक न्यारी,
गाँवों का जीवन ऐसा अद्भुत स्वर्गिक महान ||