छुक छुक करती गाडी आई , लगा मुझे कहीं वही तो नहीं!
गया दौड़ के देखन को , कही यह वही तो नहीं!
एक एक कर सब जन उतरें, लगा ऐसे, जिसे मैं ढूंढूं वो तो नहीं!
कर रहा था प्रतीक्षा पिछले चार महीनों से, अब देखूं कहीं वो आई तो नहीं!!
लगता है सबमें जैसे वो हो, लेकिन इनमे से कोई वो नहीं!
आह..क्या सुन्दर पल थे जब साथ बैठ के हंसा खेला गुनगुनाया करते थे,
क्या दिन थे वो - कही वही दिन फिर से लौट आने को तो नहीं!
देखूं तो जरा, कहीं ये वही तो नहीं!!
लगता है सब उतर चले, क्यों दिल कहता है वो आयी है, लगता तो नहीं!
हुआ यही था महीने भर पहले, कही इस बार फिर से वो होने को तो नहीं!
दिल तो कहता है, पगला है ना! पर उसके कहे कोई चलता ही तो नहीं!!
बचपन से एक आस लगाये बैठा हूँ, ना कहा मैंने वो समझी भी तो नहीं!
अबके कहे दूंगा सब कुछ, लेकिन बस एक बार वो मिले तो सही!
यही सोचते सोचते पगले हो गए घंटे चार, एक बार फिर से हुआ,
कहा लेकिन वो आयी क्यों नहीं!!
होगा कुछ तो इसका कारण, वो बिलकुल ऐसी तो नहीं!
नहीं कहता कि आओ, मुझे अपनाओ..लेकिन एक बार आना तो बनता था,
एक जवाब तो बनता था, अब तो उसकी बिह उम्मीद नहीं!
आह... यह जिंदगी है, किसी के कहने सुनने से चलती भी तो नहीं!!
याद हैं वोह दिन जब स्कूल जाना अच्छा लगता था...इसलिए नहीं की पढना है....उससे तोह भागते थे.. पर वोह गम दोस्तों से मिलने की ख़ुशी में खो जाती थी... और आज भी वो अहसास है की बचपन क इंतज़ार के पल आज की सफलताओं से कहीं ज्यादा यादगार हैं... बचपन की लडाइयां आज के इजहारे मोहब्बत से ज्यादा मीठी हैं... बचपन के वोह दिन आज की रातों को भी याद आते हैं .. और आँखों की कोरों में सुबह सूखी धार मिलती है कभी कभी ... पर वोह लौट कर न आने हैं न आयेंगे :(
ReplyDeleteSattu to pahle poem me hi PRO ban gaya....gr8 !!!!
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